भोपाल। अल्पसंख्यक कल्याण विभाग मुस्लिम इदारों में नियुक्तियों के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पा रहा है। अभी मप्र वक्फ बोर्ड में सदस्यों की नियुक्ति का मामला अदालत की दहलीज पर घिसट ही रहा है। ऐसे में चंद दिनों पहले नियुक्त किए गए सदस्यों पर सवाल खड़े हो गए हैं। मप्र अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा करीब एक डेढ़ माह पहले नियुक्त किए मप्र राज्य हज कमेटी के 12 सदस्यों की योग्यता को इंदौर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है।

सदस्यों की योग्यता पर सवाल उठाए

उज्जैन निवासी लतीफ शाह द्वारा दायर की गई याचिका क्रमांक 29807/22 पर मंगलवार को चर्चा हुई। जिसमें याचिकाकर्ता के वकील ने नियुक्त किए गए सदस्यों की योग्यता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने हज अधिनियम 2002 के प्रावधानों को दरकिनार कर ये नियुक्तियां की हैं। उन्होंने तर्क दिया कि विभाग ने अधिनियम में तय की गई सदस्यों की योग्यता का पालन नहीं किया है। इस बीच न्यायाधीश ने विस्तार से चर्चा करते हुए नियुक्ति पर की जा रही आपत्ति का कारण जाना। जिसके बाद उन्होंने अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को नोटिस जारी करने के लिए निर्देशित कर दिया है।

क्या होगा आगे

अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा नियुक्त किए गए सदस्यों में से एक सदस्य को हज कमेटी अध्यक्ष के रूप में चुन लिया गया है। अदालत द्वारा जारी किए जाने वाले नोटिस के बाद विभाग को सदस्यों की योग्यता साबित करना होगी। साथ ही इनकी नियुक्ति का आधार भी अदालत को बताना होगा। विभाग अगर ये जवाब नहीं दे पाया तो हज कमेटी की ये नियुक्तियां निरस्त हो सकती हैं। साथ ही अध्यक्ष समेत सदस्यों के कार्यकाल के दौरान उनकी सुविधाओं, वेतन, भत्तों आदि की रीकवरी भी हो सकती है।

सतर्कता काम नहीं आई

सूत्रों का कहना है कि मप्र राज्य हज कमेटी सदस्यों की नियुक्ति के समय से ही इसमें शामिल कई नामों को लेकर आपत्ति जताई जा रही थी। इन स्थितियों को देखते हुए कमेटी में शामिल लोगों ने किसी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए जबलपुर हाईकोर्ट में एक कैवियेट दाखिल कर दी थी। लेकिन विरोधियों ने दो कदम आगे चलकर इस मामले को इंदौर हाईकोर्ट में दाखिल कर दिया।

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अल्पसंख्यक कल्याण की मुश्किल

जबलपुर हाईकोर्ट के एक आदेश पर अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने मप्र वक्फ बोर्ड गठन की प्रक्रिया शुरू की थी। लेकिन इसमें शामिल कुछ सदस्यों की योग्यता पर सवाल खड़े हो गए। मामला हाईकोर्ट पहुंचा और अब तक उलझा हुआ है। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के परिपालन में मप्र राज्य हज कमेटी गठन का काम शुरू हुआ तो विभाग उसी गलती को दोहरा बैठा। नतीजा फिर अदालती कार्यवाही के रूप में सामने है। बार बार हो रही प्रशासनिक गलतियों से जहां विभाग की छवि धूमिल हो रही है, वहीं इसका बुरा असर सरकार की प्रतिष्ठा पर भी पड़ रहा है।