पर्यावरण हितैषी कार्य है, फ्लाई एश से ईंट बनाना

भोपाल।आजीविका मिशन के अंतर्गत स्व-सहायता समूहों के माध्यम से फ्लाई एश (राख) से ईंट निर्माण इकाइयाँ शुरू की गई हैं। इस ईंट के निर्माण में मिट्टी एवं लकड़ी का उपयोग न होने से यह पर्यावरण की सेहत के लिये भी अच्छी हैं, साथ ही कम लागत एवं कम समय में बनने से समूहों को भी ज्यादा मुनाफा मिल रहा है।

स्व-सहायता समूहों ने प्रथम चरण में एवं सिंगरौली जिलों में 5 निर्माण इकाइयों में यह कार्य शुरू किया गया था। वर्तमान में 5 जिलों बैतूल, खण्डवा, सागर, सीधी एवं सिंगरौली में कुल 9 इकाइयों में फ्लाई एश से ईंटे बन रही हैं। शीघ्र ही 4 और जिलों नरसिंहपुर, सिवनी, शहडोल एवं उमरिया में 10 इकाई शुरू की जायेंगी।

कुल 9 जिलों में 19 इकाइयों का संचालन करने के लिये 23 समूहों के 230 सदस्यों को चिन्हित किया गया है। समूहों द्वारा तैयार की जाने वाली ईंटों को ग्राम पंचायतों में चल रहे विभिन्न निर्माण कार्यों में उपयोग के लिये प्राथमिकता से खरीदा जायेगा। सस्ती एवं अच्छी होने के कारण निजी क्षेत्र के निर्माण कार्यों में भी इन ईंटों की माँग है।

आजीविका मिशन अंतर्गत गठित स्व-सहायता समूह अनेक प्रकार की आजीविका गतिविधियाँ कर रहे हैं। इनमें विभिन्न प्रकार की कृषि एवं गैर कृषि आधारित गतिविधियाँ शामिल हैं। बैतूल जिले के भैंसदेही ब्लॉक में 2, नरसिंहपुर जिले के चीचली ब्लॉक में एक, सागर के मालथौन में एक, शहडोल के सुहागपुर में 2, सिवनी के घनसौर में 2, सिंगरौली के बैढ़न ब्लॉक में एक, उमरिया के करकेली ब्लॉक में एक इकाइयाँ लगाया जाना प्रक्रियाधीन है।

क्या है फ्लाई एश ?

थर्मल पावर स्टेशनों एवं अन्य फैक्ट्रियों में कोयले का उपयोग होने के बाद निकलने वाली राख को फ्लाई एश कहते हैं। ईंट निर्माण के लिये यह अन्य रॉ-मटेरियल की तुलना में यह एश सस्ता, अच्छा एवं बेहतर विकल्प है। इससे बनी ईंटों की गुणवत्ता अच्छी एवं लागत कम होने से इनकी माँग अधिक होगी।

परम्परागत ईंटों से अच्छी और सस्ती

परम्परागत तरीके से ईंट निर्माण में कच्ची ईंट को भट्टे में पकाने के लिये लकड़ी अथवा कोयले जैसे ईंधन की जरूरत होती है। एक बार में पूरा भट्टा न पकने पर फिर से भट्टा लगाना पड़ता है, जिससे लागत और बढ़ जाती है। मिट्टी की ईंट को सुखाने के लिये अच्छी-खासी धूप का होना जरूरी है, बारिश में यह कार्य नहीं होता। इसके उलट फ्लाई एश से ईंट निर्माण का काम पर्यावरण हितैषी होने के साथ-साथ वर्षभर चलते रहना वाला व्यवसाय है।

इकाई की 75 से 80 हजार लागत

इकाई की स्थापना व्यय के लिये 75 से 80 हजार रुपये की पूँजी ऋण के रूप में समूहों को उपलब्ध कराई गई है। प्रति एक हजार ईंट निर्माण में लगभग 3 हजार रुपये व्यय होता है। एक हजार ईंट औसतन लगभग 4 से 5 हजार रुपये की बिक जाती हैं। इस प्रकार समूह को एक हजार ईंट बनाकर बेचने में लगभग 2 हजार रुपये का मुनाफा हो जाता है।